Jivitputrika or Jitiya Vrat Katha In Hindi

Jivitputrika or Jitiya Vrat Katha In Hindi 

जीवित्पुत्रिका व्रत 2021: पुत्र की रक्षा के लिए किया जाने वाला व्रत जीवित्पुत्रिका या जितिया इस साल 29 सितंबर को मनाया जायेगा। इस दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा और कुशलता के लिए निर्जला व्रत करती हैं। जीमूतवाहन के नाम पर ही जीवित्पुत्रिका व्रत का नाम पड़ा है।

जीवित्पुत्रिका व्रत, यह व्रत संतान की मंगल कामना के लिए किया जाता हैं. यह व्रत मातायें रखती हैं. जीवित्पुत्रिका व्रत निर्जला किया जाता हैं जिसमे पूरा दिन एवम रात पानी नही लिया जाता. इसे तीन दिन तक मनाया जाता हैं. संतान की सुरक्षा के लिए इस व्रत को सबसे अधिक महत्व दिया जाता हैं. पौराणिक समय से इसकी प्रथा चली आ रही हैं.

कौन था जीमूतवाहन? जिसके नाम पर पड़ा है जीवित्पुत्रिका व्रत या जितिया

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा  (Jivitputrika Vrat Story In Hindi)

जीमूतवाहन एक गंधर्व राजकुमार थे, जो बेहद उदार और परोपकारी इंसान थे। उनके पिता ने राजपाट छोड़ दिया और वन में चले गए, जिसके बाद जीमूतवाहन को राजा बना दिया गया। वे राजकाज ठीक से चला रहे थे लेकिन उनका मन उसमें नहीं लगता था। एक दिन वे राजपाट भाइयों को सौंपकर अपने पिता के पास ही वन में चल दिए। वहां उनका विवाह मलयवती नामक ​कन्या से हुआ।

एक रोज वन में वे एक वृद्धा से मिले। उसका संबंध नागवंश था। वह काफी डरी और सहमी थी। रो रही थी। जीमूतवाहन की नजर उस पर पड़ी, तो उनसे रहा नहीं गया और उससे रोने का कारण पूछा। उसने बताया कि पक्षीराज गरुड़ को नागों ने वचन दिया है कि हर रोज एक नाग उनके पास आहार स्वरुप जाएगा और उससे वे अपनी भूख शांत कर लिया करेंगे।

उस वृद्धा ने कहा कि आज उसके बेटे की बारी है। उसका नाम शंखचूड़ है, चह आज पक्षीराज गरुड़ का निवाला बन जाएगा। यह कहकर वृद्धा रोने लगी। इस पर दयावान जीमूतवाहन ने कहा कि आपके बेटे को कुछ नहीं होगा। वह आज पक्षीराज गरुड़ के पास नहीं जाएगा। उसके बदले वे जाएंगे। ऐसा कहकर जीमूतवाहन तय समय पर स्वयं गरुड़ देव के पास पहुंच गए।

जीमूतवाहन लाल कपड़े में लिपटे थे। गरुड़ देव ने उनको पंजे में दबोच लिया और उड़ गए। इस बीच उन्होंने देखा कि जीमूतवाहन रो रहे हैं और कराह रहे हैं। तब वे एक पहाड़ के शिखर पर रुक गए और जीमूतवाहन को मुक्त किया। तब उन्होंने सारी घटना बताई।

गरुड़ देव जीमूतवाहन की दया और साहस की भावना से काफी प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवन दान दे दिया। साथ ही उन्होंने वचन दिया कि आज से वे कभी भी किसी नाग को अपना ग्रास नहीं बनाएंगे। इस प्रकार से जीमूतवाहन के कारण नागों के वंश की रक्षा हुई। इसके बाद से ही आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और जीवित्पुत्रिका का निर्जला व्रत रखा जाता है।

जितिया व्रत की पौराणिक कथा (Jitiya Vrat Katha In Hindi)

जीत‍िया की एक कथा यह भी म‍िलती है…

नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी. उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था. नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी. उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी. दोनों पक्की सहेलियां थीं. दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया. लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया. सियारिन को अब भूख लगने लगी थी. मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया. पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया. फिर अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया. उनके पिता का नाम भास्कर था. चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया. शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई. सिया‍रन, छोटी बहन के रूप में जन्‍मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया. उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई. अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई. भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए. पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे. कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए. वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे. कपुरावती के मन में उन्‍हें देख इर्ष्या की भावना आ गयी. उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए. उन्‍हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया. यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया. इससे उनमें जान आ गई. सातों युवक जिंदा हो गए और घर लौट आए. जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए. दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी. जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी. वहां सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी. जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई. अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था. भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं. वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं. कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई. जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्‍होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया.

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा (Jivitputrika Vrat Ka Kahani in Hindi)

जीत‍िया की एक कथा यह भी म‍िलती है…

यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं. महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी. उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था. उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया. गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना. तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं.

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